Sunday, 10 February 2013

गुरु या सूर्य

निशारुपी अंधकार में सूर्य की आभा
करती उजेला इस धरा पर,
यह उजेला ही तो प्रेरक है 
कर्मठ मनु के लिए।

इसी तरह ज्ञान की आभा 
करती प्रेरित कर्मण्य-अकर्मण्य शिष्य को, 
बाध्यता नहीं है गुरु-मन में और न ही है वैमनस्य 
उसके लिए समभाव है कर्मण्य-अकर्मण्य।

सूर्य का प्रदीप्यमान होना कर्म है उसका, 
पर वह भी होजाता है बेबस जब 
होता है ग्रहण या ढक लेते हैं बादल बरसात में,
यही है कर्त्तव्यशून्यता सूर्य की।

गुरु-कर्म एक कर्त्तव्य है,
यही परिलक्षित होता है सामर्थ्य में 
कि नहीं है कोई बाध्यता परिस्थितियों की,
अतएव सबसे श्रेष्ठ गुरु है।

-पुरु

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